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Saturday, March 29, 2025
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ख़लील जिब्रान की एक लघुकथा – पागलख़ाना

पागलख़ाने के बाग़ में मैंने एक नौजवान को देखा जिसका ख़ूबसूरत चेहरा पीला पड़ता जा रहा था । जिस पर तहय्युर ( हैरानी ) की स्याही चढ़ी हुई थी । मैं उसके क़रीब जाकर बेंच पर बैठ गया और पूछा ……(Khalil Gibran The Madhouse)

“तुम यहाँ कैसे ?”

उसने हैरान होकर मेरी तरफ़ देखा और कहा ,

“यहां गरचे आपका सवाल बेमानी है, लेकिन आपने पूछा है तो, मैं जवाब दूंगा। ”

फिर उसने कहना शुरू किया ……

“मेरे बाप की ख़्वाहिश थी कि मैं बिल्कुल हू-ब-हू उस जैसा बनूं और यही ख़्वाहिश मेरे चचा की भी थी । इसके बरख़िलाफ़ मेरी मां की आरज़ू थी कि मैं अपने मरहूम नाना के नक़्श-ए-क़दम पर चलूं । और मेरी बहन अपने मल्लाह शौहर को मेरे लिए बेहतरीन नमूना मानती थी । मेरा भाई चाहता था कि मैं और कुछ नहीं बस उसकी तरह एक नामी पहलवान बनूं । और यही हाल कम-ओ-बेश मेरे हर उस्ताद का था । फ़लसफ़े का उसताद फ़लासफ़र तो मौसीक़ी का उस्ताद गवैय्या और अदब का उस्ताद अदीब बनाना चाहता था वग़ैरह-वग़ैरह … (Khalil Gibran The Madhouse)

ग़रज़ की हर शख़्स अपने जौहर मेरे अंदर ठूंस देना चाहता था कि वह अपने हुनर मेरे अंदर यूं देखते जैसे कोई शख़्स आईने में अपनी शकल देखता है। (Khalil Gibran The Madhouse)

मैं यहां इसलिए चला आया कि निसबतन यहां ज़्यादा सुकून है । कम से कम मैं यहां वह तो बन सकता हूं , जो मैं बना रहना चाहता हूं । फिर अचानक वह मुड़ा और मुझसे पूछा आप यहां कैसे पहुंचे ? ऊंची तालीम या अच्छी सोहबत हासिल करने के लिए ?”

“नहीं-नहीं मैं तो सिर्फ़ मुलाक़ाती हूं।”

मैंने उत्तर दिया।

उसने बड़ी हैरत भरी नज़रों से मेरी तरफ़ देखा और बहुत पुरसुकून लहजे में बोला ,

“ओह अब मैं समझा। आप उनमें से हैं जो, इधर की दीवार के उस तरफ़ वाले पागलख़ाने में रहते हैं। ”


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